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Rahat Indori Shayari » राहत इंदौरी शायरी हिंदी

Rahat Indori Shayari In Hindi » राहत इंदौरी शायरी हिंदी Poetry Quotes Rahat Indori Best Latest New Shayari 2021 For Use Whatsapp Status Share On Facebook Shayari 2 लाइन

Rahat Indori Shayari Poetry Quotes

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1.चेहरों के लिए आईने कुर्बान किये हैं,
इस शौक में अपने बड़े नुकसान किये हैं,​

महफ़िल में मुझे गालियाँ देकर है बहुत खुश​,
जिस शख्स पर मैंने बड़े एहसान किये है।

2.उसे अब के वफाओं से गुजर जाने की जल्दी थी
मगर इस बार मुझ को अपने घर जाने की जल्दी थी

इरादा था कि मैं कुछ देर तूफाँ का मज़ा लेता
मगर बेचारे दरिया को उतर जाने की जल्दी थी

मैं अपनी मुट्ठियों मैं क़ैद कर लेता ज़मीनों को
मगर मेरे क़बीले को बिखर जाने की जल्दी थी

मैं आखिर कौनसा मौसम तुम्हारे नाम कर देता
यहाँ हर एक मौसम को गुजर जाने की जल्दी थी

वो शाखों से जुदा होते हुए पत्तों पे हँसते थे
बड़े जिंदा-नज़र थे जिन को मर जाने की जल्दी थी

मैं साबित किस तरह करता कि हर आईना झूठा है
कई कम-ज़र्फ़ चेहरों को उतर जाने की जल्दी थी

3.लवे दीयों की हवा में उछालते रहना
गुलो के रंग पे तेजाब डालते रहना

मैं नूर बन के ज़माने में फ़ैल जाऊँगा
तुम आफताब में कीड़े निकालते रहना

4.जुबा तो खोल, नज़र तो मिला,जवाब तो दे
मैं कितनी बार लुटा हु, मुझे हिसाब तो दे

तेरे बदन की लिखावट में हैं उतार चढाव
मैं तुझको कैसे पढूंगा, मुझे किताब तो दे

तेरा सवाल है साकी के ज़िन्दगी क्या है
जवाब देता हु पहले मुझे शराब तो दे

5.सफ़र की हद है वहां तक की कुछ निशान रहे,
चले चलो की जहाँ तक ये आसमान  रहे ।

ये क्या उठाये कदम और आ गयी मंजिल,
मज़ा तो तब है के पैरों में कुछ थकान रहे ।

वो शख्स मुझ को कोई जालसाज़ लगता हैं,
तुम उसको दोस्त समझते हो फिर भी ध्यान रहे ।

मुझे ज़मीं की गहराइयों ने दबा लिया,
मैं चाहता था मेरे सर पे आसमान रहे ।

अब अपने बीच मरासिम नहीं अदावत है,
मगर ये बात हमारे ही दरमियान रहे ।

सितारों की फसलें उगा ना सका कोई,
मेरी ज़मीं पे कितने ही आसमान रहे ।

वो एक सवाल है फिर उसका सामना होगा,
दुआ करो कि सलामत मेरी ज़बान रहे ।

6.तुफानो से आँख मिलाओ, सैलाबों पे वार करो
मल्लाहो का चक्कर छोड़ो, तैर कर दरिया पार करो

तुमको तुम्हारा फ़र्ज़ मुबारख, हमको मुबारख अपना सुलूक
हम फूलो की शाख तराशे, तुम चाकू पर धार करो

फूलो की दुकाने खोलो, खुशबु का व्यापार करो
इश्क खता हैं, तो ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो

7.उसकी कत्थई आंखों में हैं जंतर मंतर सब
चाक़ू वाक़ू, छुरियां वुरियां, ख़ंजर वंजर सब

जिस दिन से तुम रूठीं,मुझ से रूठे रूठे हैं
चादर वादर, तकिया वकिया, बिस्तर विस्तर सब

मुझसे बिछड़ कर, वो भी कहां अब पहले जैसी है
फीके पड़ गए कपड़े वपड़े, ज़ेवर वेवर सब

इश्क-विश्क के सारे नुस्खे मुझसे सिखते है
ताहिर-वाहिर, मंज़र-वंज़र, जोहर-वोहर सब

आखिर मैं किस दिन डूबूंगा फ़िक्रें करते हैं
कश्ती-वश्ती, दरिया-वरिया, लंगर-वंगर सब

8.जा के ये कह दे कोई शोलों से चिंगारी से
फूल इस बार खिले हैं बड़ी तैयारी से

अपनी हर साँस को नीलाम किया है मैंने
लोग आसान हुए हैं बड़ी दुश्वारी से

ज़हन में जब भी तेरे ख़त की इबारत चमकी
एक खुश्बू सी निकलने लगी अलमारी से

शाहज़ादे से मुलाक़ात तो ना-मुमकिन है
चलिए मिल आते है चल कर किसी दरबारी से

बादशाहों से भी फेंके हुए सिक्के न लिए
हम ने खैरात भी माँगी है तो खुद्दारी से

9.बन के इक हादसा बाज़ार में आ जाएगा
जो नहीं होगा वो अखबार में आ जाएगा

चोर उचक्कों की करो कद्र, की मालूम नहीं
कौन, कब, कौन सी  सरकार में आ जाएगा

अपनी साहिल से ये अंगारे हटालो वरना
सारा पानी मेरी तलवार में आ जाएगा

10.लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के संभलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं

नींद से मेरा त’अल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं

11.साँसों की सीडियों से उतर आई जिंदगी
बुझते हुए दिए की तरह, जल रहे हैं हम

उम्रों की धुप, जिस्म का दरिया सुखा गयी
हैं हम भी आफताब, मगर ढल रहे हैं हम

12.इश्क में जीत के आने के लिए काफी हूँ
मैं निहत्था ही ज़माने  के लिए काफी हूँ

हर हकीकत को मेरी, ख्वाब समझनेवाले
मैं तेरी नींद उड़ाने के लिए काफी हूँ

मेरे बच्चो मुझे दिल खोल के तुम खर्च करो
मै अकेला ही कमाने के लिए काफी हूँ

एक अख़बार हूँ, औकात ही क्या मेरी
मगर शहर में आग लगाने के लिए काफी हूँ

13.दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं
सब अपने चेहरों पे दोहरी नका़ब रखते हैं

हमें चराग समझ कर बुझा न पाओगे
हम अपने घर में कई आफ़ताब रखते हैं

बहुत से लोग कि जो हर्फ़-आश्ना भी नहीं
इसी में खुश हैं कि तेरी किताब रखते हैं

ये मैकदा है, वो मस्जिद है, वो है बुत-खाना
कहीं भी जाओ फ़रिश्ते हिसाब रखते हैं

हमारे शहर के मंजर न देख पायेंगे
यहाँ के लोग तो आँखों में ख्वाब रखते हैं

14.राज़ जो कुछ हो इशारों में बता भी देना
हाथ जब उससे मिलाना तो दबा भी देना

वैसे इस खत में कोई बात नहीं है
फिर भी एतिहातन इसे पढ़ लो तो जला भी देना

नशा वेसे तो बुरी शै है, मगर
“राहत” से सुनना हो तो थोड़ी सी पिला भी देना

15.इन्तेज़ामात  नए सिरे से संभाले जाएँ
जितने कमजर्फ हैं महफ़िल से निकाले जाएँ

मेरा घर आग की लपटों में छुपा हैं लेकिन
जब मज़ा हैं तेरे आँगन में उजाला जाएँ

गम सलामत हैं तो पीते ही रहेंगे लेकिन
पहले मयखाने की हालत संभाली जाए

खाली वक्तों में कहीं बैठ के रोलें यारों
फुरसतें हैं तो समंदर ही खंगाले जाए

खाक में यु ना मिला ज़ब्त की तौहीन ना कर
ये वो आसूं हैं जो दुनिया को बहा ले जाएँ

हम भी प्यासे हैं ये अहसास तो हो साकी को
खाली शीशे ही हवाओं में उछाले जाए

आओ शहर में नए दोस्त बनाएं “राहत”
आस्तीनों में चलो साँप ही पाले जाए

16.ये हादसा तो किसी दिन गुज़रने वाला था
मैं बच भी जाता तो इक रोज़ मरने वाला था

तेरे सलूक तेरी आगही की उम्र दराज़
मेरे अज़ीज़ मेरा ज़ख़्म भरने वाला था

बुलंदियों का नशा टूट कर बिखरने लगा
मेरा जहाज़ ज़मीन पर उतरने वाला था

मेरा नसीब मेरे हाथ काट गए वर्ना
मैं तेरी माँग में सिंदूर भरने वाला था

मेरे चिराग मेरी शब मेरी मुंडेरें हैं
मैं कब शरीर हवाओं से डरने वाला था

17.इससे पहले की हवा शोर मचाने लग जाए
मेरे “अल्लाह” मेरी ख़ाक ठिकाने लग जाए

घेरे रहते हैं खाली ख्वाब मेरी आँखों को
काश कुछ  देर मुझे नींद भी आने लग जाए

साल भर ईद का रास्ता नहीं देखा जाता
वो गले मुझसे किसी और बहाने लग जाए

18.दोस्ती जब किसी से की जाये
दुश्मनों की भी राय ली जाए

मौत का ज़हर हैं फिजाओं में
अब कहा जा के सांस ली जाए

बस इसी सोच में हु डूबा हुआ
ये नदी कैसे पार की जाए

मेरे माज़ि के ज़ख्म भरने लगे
आज फिर कोई भूल की जाए

बोतलें खोल के तो पि बरसों
आज दिल खोल के पि जाए

19.फैसला जो कुछ भी हो, हमें मंजूर होना चाहिए
जंग हो या इश्क हो, भरपूर होना चाहिए

भूलना भी हैं, जरुरी याद रखने के लिए
पास रहना है, तो थोडा दूर होना चाहिए

कट गई है उम्र सारी जिनकी पत्थर तोड़ते
अब तो इन हाथो में कोहिनूर होना चाहिए

अपने हाथों से बनाया है खुदा ने आपको
आपको थोड़ा बहुत मगरूर होना चाहिए

20.यही ईमान लिखते हैं, यही ईमान पढ़ते हैं
हमें कुछ और मत पढवाओ, हम कुरान  पढ़ते हैं

यहीं के सारे मंजर हैं, यहीं के सारे मौसम हैं
वो अंधे हैं, जो इन आँखों में पाकिस्तान पढ़ते हैं

21.चलते फिरते हुए महताब दिखाएंगे तुम्हें ,
हमसे मिलना कभी, पंजाब दिखाएंगे तुम्हें |

चांद हर छत पर है, सूरज है हर आंगन में,
नींद से जागो तो कुछ ख्वाब दिखाएंगे तुम्हें |

रेत बन जाता है, उड़ जाता है सारा पानी
जून में गांव का तालाब दिखाएंगे तुम्हे

पूछते क्या हो कि रुमाल के पीछे क्या है,
फिर किसी रोज ये सैलाब दिखाएंगे तुम्हें |