kumar-vishwas-shayari

Kumar Vishwas Shayari Poetry » कुमार विश्वास शायरी हिंदी

Kumar Vishwas Shayari Poetry In Hindi » कुमार विश्वास शायरी हिंदी Poetry Quotes Whatsapp Facebook Share On Friends Best New Latest Shayari On Kumar Vishwas 2021

kumar vishwas shayari

kumar-vishwas-shayari-poetry

(1.इस दुनिया ने मेरी वफ़ा का कितना ऊँचा मोल दिया,
पैरों में जंजीरे डाली हाथों में कश्कोल दिया

जब भी कोई इनाम मिला है मेरा नाम भी भूल गए,
जब भी कोई इलज़ाम लगा है मुझ पे लाकर ढोल दिया

अब गम आये, खुशिया आये, मौत आये, या तू आये,
मैंने तो बस आहट पायी और दरवाज़ा खोल दिया।)

(2.मौसमो का ख़याल रखा करो
कुछ लहू में उबाल रखा करो

जिंदगी रोज़ मरती रहती है
ठीक से देखभाल रखा करो

जाने कब सच का सामना हो जाए
कोई रास्ता निकाल रखा करो

गालिबो को रखो दिमागों में
दिल यागना मिसाल रखा करो

सुलाह करते रहा करो हर दिन
दुश्मनो को निढाल रखा करो

खाली खाली उदास आँखे
ईनमे कुछ ख्वाब पाल रखा करो

धुप पर सारा काम छोड़ दिया
खून में कुछ उछाल रखा करो

फिर वो चाकू चला नहीं सकता
हाथ गर्दन में डाल रखा करो

लाख सूरज से दोस्ताना हो
चंद जुगनू भी पाल रखा करो)

(3.अब हम मकान में ताला लगाने वाले हैं
पता चला हैं की मेहमान आने वाले हैं

इन्हें जहाज़ की उचाईयो से क्या मतलब
ये लोग सिर्फ कबूतर उड़ाने वाले है

हमें हक़ीर न जानो, हम अपने नेज़े से
ग़ज़ल की आँखों में काजल लगाने वाले है)

(4.आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो

राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं
मंज़िलें रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो

एक ही नदी के हैं ये दो किनारे दोस्तो
दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो

आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में
कूच का ऐलान होने को है तय्यारी रखो

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ायम रहे
नींद रखो या न रखो ख़्वाब मे यारी रखो

ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन
दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो

ले तो आए शायरी बाज़ार में ‘राहत’ मियाँ
क्या ज़रूरी है कि लहजे को भी बाज़ारी रखो)

(5.जागने की भी, जगाने की भी, आदत हो जाए
काश तुझको किसी शायर से मोहब्बत हो जाए

दूर हम कितने दिन से हैं, ये कभी गौर किया
फिर न कहना जो अयानत में खयानत हो जाए

जुगनुओं तुमको नए चान्द उगाने होंगे…
इससे पहले की अंधेरो की हुकूमत हो जाए…

उखड़े पड़ते हैं मेरी कब्र के पत्थर हर दिन…
तुम जो आ जाओ किसी दिन तो मरम्मत हो जाये…)

(6.सूरज, सितारे, चाँद मेरे साथ में रहें
जब तक तुम्हारे हाथ मेरे हाथ में रहें

शाखों से टूट जाए वो पत्ते नहीं हैं हम
आंधी से कोई कह दे की औकात में रहें)

(7.कभी महक की तरह हम गुलों से उड़ते  हैं
कभी धुएं की तरह पर्वतों से उड़ते हैं

ये कैचियाँ हमें उड़ने से खाक रोकेंगी
की हम परों से नहीं हौसलों से उड़ते हैं

8.हर एक हर्फ़ का अंदाज़ बदल रखा हैं
आज से हमने तेरा नाम ग़ज़ल रखा हैं)

मैंने शाहों की मोहब्बत का भरम तोड़ दिया
मेरे कमरे में भी एक “ताजमहल” रखा हैं

(9.नए सफ़र का नया इंतज़ाम कह देंगे
हवा को धुप, चरागों को शाम कह देंगे

किसी से हाथ भी छुप कर मिलाइए
वरना इसे भी मौलवी साहब हराम कह देंगे)

(10.जवान आँखों के जुगनू चमक रहे होंगे
अब अपने गाँव में अमरुद पक रहे होंगे

भुलादे मुझको मगर, मेरी उंगलियों के निशान
तेरे बदन पे अभी तक चमक रहे होंगे)

(11.इश्क ने गूथें थे जो गजरे नुकीले हो गए
तेरे हाथों में तो ये कंगन भी ढीले हो गए

फूल बेचारे अकेले रह गए है शाख पर
गाँव की सब तितलियों के हाथ पीले हो गए

क्या जरुरी है करे विषपान हम शिव की तरह
सिर्फ जामुन खा लिए और होंठ नीले हो गए)

(12.सरहदों पर तनाव है क्या
ज़रा पता तो करो चुनाव हैं क्या

खौफ़ बिखरा है दोनों सम्तों में
तीसरी सम्त का दबाव है क्या

(13.ये सहारा जो न हो तो परेशां हो जाए
मुश्किलें जान ही लेले अगर आसान हो जाए

ये कुछ लोग फरिस्तों से बने फिरते हैं
मेरे हत्थे कभी चढ़ जाये तो इन्सां हो जाए)

(14.रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं
चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं

मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं

कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता हैं

ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं  मगर दिल अक्सर
नाम सुनता हैं  तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं

उसकी याद आई हैं  साँसों ज़रा धीरे चलो
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता हैं)