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राहत इंदौरी शायरी हिंदी 2 लाइन 4 लाइन

राहत इंदौरी शायरी हिंदी 2 लाइन 4 लाइन Love Sad Emotional Shayari From Rhahat Indori New Collection For Friends Guys Share Shayari Facebook And Whatsapp Apne Facebook पे Share Kare

राहत इंदौरी शायरी हिंदी 2 लाइन

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1.झूठों ने झूठों से कहा है सच बोलो
सरकारी एलान हुआ है सच बोलो

घर के अंदर तो झूठों की एक मंडी है
दरवाज़े पर लिखा हुआ है सच बोलो

गुलदस्ते पर यकजहती लिख रक्खा है
गुलदस्ते के अंदर क्या है सच बोलो

गंगा मइया डूबने वाले अपने थे
नाव में किसने छेद किया है सच बोलो

2.आज हम दोंनों को फुर्सत है चलो इश्क करें
इश्क दोंनों की जरूरत है चलो इश्क करें

इसमें नुकसान का खतरा ही नहीं रहता है
ये मुनाफे की तिजारत है चलो इश्क करें

आप हिन्दु मैं मुसलमान ये ईसाई वो सिख
यार छोड़ो ये सियासत है चलो इश्क करें

रोज़ रोज़ आते नहीं ऐसे नशीले मौसम
शाम है जाम है ‘राहत’ है चलो इश्क़ करे

देवताओ ने जो बक्शा है वो वरदान है इश्क़
इश्क़ नबियो की विरासत है चलो इश्क़ करे

3.अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ
मैं चाहता था चिराग़ों को आफ़्ताब करूँ

बुतों से मुझको इजाज़त अगर कभी मिल जाए
तो शहर-भर के ख़ुदाओं को बे-नक़ाब करूँ

मैं करवटों के नए ज़ाविये लिखूँ शब-भर
ये इश्क़ है तो कहाँ ज़िंदगी अज़ाब करूँ

है मेरे चारों तरफ़ भीड़ गूँगे-बहरों की
किसे ख़तीब बनाऊँ किसे ख़िताब करूँ

उस आदमी को बस इक धुन सवार रहती है
बहुत हसीं है ये दुनिया इसे ख़राब करूँ

ये ज़िंदगी जो मुझे क़र्ज़दार करती रही
कहीं अकेले में मिल जाए तो हिसाब करूँ

4.तेरा मेरा नाम ख़बर में रहता था
दिन बीते, एक सौदा सर में रहता था

मेरा रस्ता तकता था एक चांद कहीं
मैं सूरज के साथ सफ़र में रहता था

सारे मंज़र गोरे-गोरे लगते थे
जाने किस का रूप नज़र में रहता था

मैंने अक्सर आंखें मूंद के देखा है
एक मंज़र जो पस-मंज़र मे रहता था

काठ की कश्ती पीठ थपकती रहती थी
दरियाओं का पांव भंवर में रहता था

उजली उजली तस्वीरें सी बनती हैं
सुनते हैं अल्लाह बशर में रहता था

मीलों तक हम चिड़ियों से उड़ जाते थे
कोई मेरे साथ सफ़र में रहता था

सुस्ताती है गर्मी जिस के साये में
ये पौधा कल धूप नगर में रहता था

धरती से जब खुद को जोड़े रहते थे
ये सारा आकाश असर में रहता था

सच का बोझ उठाये हूँ अब पलकों पर
पहले मैं भी ख़्वाब नगर में रहता था

5.बैठे बैठे कोई ख़याल आया,
ज़िंदा रहने का फिर सवाल आया !

कौन दरियाओं का हिसाब रखे,
नेकियाँ नेकियों में डाल आया !

ज़िंदगी किस तरह गुज़ारी जाये,
ज़िंदगी भर न ये कमाल आया !

झूठ बोला है कोई आईना वर्ना,
पत्थर में कैसे बाल आया !

वो जो दो-गज़ ज़मीं थी मेरे नाम,
आसमाँ की तरफ़ उछाल आया !

क्यूँ ये सैलाब सा है आँखों में,
मुस्कुराए था मैं ख़याल आया !!

6.मुझे डुबो के बहुत शर्मसार रहती है
वो एक मौज जो दरिया के पार रहती है

हमारे ताक़ भी बे-ज़ार हैं उजालों से
दिए की लौ भी हवा पर सवार रहती है

फिर उस के बाद वही बासी मंज़रों के जुलूस
बहार चंद ही लम्हे बहार रहती है

इसी से क़र्ज़ चुकाए हैं मैं ने सदियों के
ये ज़िंदगी जो हमेशा उधार रहती है

हमारी शहर के दानिशवरों से यारी है
इसी लिए तो क़बा तार तार रहती है

मुझे ख़रीदने वालो क़तार में आओ
वो चीज़ हूँ जो पस-ए-इश्तिहार रहती है

7.चराग़ों का घराना चल रहा है
हवा से दोस्ताना चल रहा है

जवानी की हवाएँ चल रही हैं
बुज़ुर्गों का ख़ज़ाना चल रहा है

मेंरी गुम-गश्तगी पर हँसने वालो
मेंरे पीछे ज़माना चल रहा है

अभी हम ज़िंदगी से मिल न पाए
तआरुफ़ ग़ाएबाना चल रहा है

नए किरदार आते जा रहे हैं
मगर नाटक पुराना चल रहा है

वही दुनिया वही साँसें वही हम
वही सब कुछ पुराना चल रहा है

ज़ियादा क्या तवक़्क़ो हो ग़ज़ल से
मियाँ बस आब-ओ-दाना चल रहा है

समुंदर से किसी दिन फिर मिलेंगे
अभी पीना-पिलाना चल रहा है

वही महशर वही मिलने का व’अदा
वही बूढ़ा बहाना चल रहा है

यहाँ इक मदरसा होता था पहले
मगर अब कार-ख़ाना चल रहा है

8.हौसले ज़िंदगी के देखते हैं
चलिए! कुछ रोज़ जी के देखते हैं

नींद पिछली सदी से ज़ख़्मी है
ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं

रोज़ हम एक अंधेरी धुँध के पार
काफ़िले रौशनी के देखते हैं

धूप इतनी कराहती क्यों है
छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं

टकटकी बाँध ली है आँखों ने
रास्ते वापसी के देखते हैं

बारिशों से तो प्यास बुझती नहीं
आइए ज़हर पी के देखते हैं

9.शजर हैं अब समर-आसार मेरे
चले आते हैं दावेदार मेरे

मुहाजिर हैं न अब अंसार मेरे
मुख़ालिफ़ हैं बहुत इस बार मेरे

यहाँ इक बूँद का मुहताज हूँ मैं
समुंदर हैं समुंदर पार मेरे

अभी मुर्दों में रूहें फूँक डालें
अगर चाहें तो ये बीमार मेरे

हवाएँ ओढ़ कर सोया था दुश्मन
गए बेकार सारे वार मेरे

मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ
यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे

हँसी में टाल देना था मुझे भी
ख़ता क्यूँ हो गए सरकार मेरे

तसव्वुर में न जाने कौन आया
महक उट्ठे दर-ओ-दीवार मेरे

तुम्हारा नाम दुनिया जानती है
बहुत रुस्वा हैं अब अशआर मेरे

भँवर में रुक गई है नाव मेरी
किनारे रह गए इस पार मेरे

मैं ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ
अभी सोए हैं पहरे-दार मेरे