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बिना गलती की सजा शायरी

बिना गलती की सजा शायरी | 

ज़िंदा हु मगर ज़िंदगी से दूर हु मैं, 
आज क्यों इस कदर मजबूर हूँ मैं,
बिना गलती की सजा मिलती है मुझे,
किस से कहूं की आखिर बेक़सूर हु मैं

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बिना गलती की सजा शायरी हिंदी

मुझसे मोहब्बत करती, तो मेरी गलती माफ़ कर जाती
एक छोटी सी बात पर, यूँ रिश्ता नहीं तोड़ जाती.

इश्क़ के खुदा से पूछो उसकी रजा क्या है,
इश्क़ अगर गुनाह है तो इसकी सजा क्या है.

कोई तुम्हें देखकर मुस्कुरा दे तो उसे प्यार मत समझो,
किसी की छोटी-सी गलती पर, उसे गुनहगार मत समझो.

ना जिद है ना कोई गुरुर है हमें, 
बस तुम्हे पाने का सुरूर है हमें,
इश्क गुनाह है तो गलती की हमने,
सजा जो भी हो मंजूर है हमें। 

क्यूँ करते हो मुझसे
इतनी ख़ामोश मुहब्बत..
लोग समझते है
इस बदनसीब का कोई नहीँ..

खुशमिजाजी मशहूर थी हमारी,
सादगी भी कमाल की थी..
हम शरारती भी इंतेहा के थे,
अब तन्हा भी बेमिसाल हैं..

दिल में है जो दर्द वो दर्द किसे बताएं!
हंसते हुए ये ज़ख्म किसे दिखाएँ!
कहती है ये दुनिया हमे खुश नसीब!
मगर इस नसीब की दास्ताँ किसे बताएं!

हर इनायत हर खुशी आपकी हो,
महक उठे वो महफ़िल जिसमे हँसी आपकी हो,
कोई भी लम्हा आप उदास ना हो,
खुदा करे ज़न्नत जैसी ज़िंदगी आपकी हो.

हम हैं कि क्या क्या सोचते हैं गलतऔरों के फेर में,
अफसोस कि खुद को भी, औरों कीनज़र से देखते हैं !

गीता का ज्ञानभी उल्टा हो गया है आजकल दोस्तो,
लोगों के शरीरज़िंदा हैं मगर, #आत्मा मरी देखते हैं!

मिट गए न जाने कितने #ख़ुदा की तलाश में,
मगर अब तो हर तरफ हम, ख़ुदा ही ख़ुदा देखते हैं !……